ककल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 2833

भाषा / Language

आज असमानी नल खुले हुए हैं....सुबह से बूंदे पड़ रहीं ।बाहर नह…

✦
आज असमानी नल खुले हुए हैं....सुबह से बूंदे पड़ रहीं ।बाहर नहीं जाना था तो सोचा खुद में चलें..... शाम भर जो जी आया लिखा.... मन रोकना नहीं आता मुझे। 😊😊😊😊 *स्मृति पटल पर उस रोज़ देखी सफ़ेद कमीज़, किताब में दबा मोरपंख और एक मुड़ा पन्ना बचा है..... बाक़ी सब शेष में दर्ज़ है। *फ़लसफ़े और आंकड़े नहीं बूझ पायेगा बेचारा प्रेम निरा अनपढ़ फिलॉस्फर है *मन से मन की मन का करने की लड़ाई हो..... तुम मैं निर्दोष हूँ मेरा प्रेम दोषी है। *अवश,विवश,परवश सब प्रेम की अदृश्य क्रियाएं हैं। अवश्य शायद प्रेम की प्रतिक्रिया है। *मेरा सूरजमुखी स्वयं को झुकता मुड़ता है मैंने अपने अंधेरे अन्तरमुखी किये हुए हैं। *मन लांघना सिखा दिया तुमने.... मेरा मन हृदय- तल में ही बजता- तजता रहता है। *अथ और अथाह के बीच की शाश्वत पंक्ति है प्रेम। लिखने से समय और दुःख सिकुड़ जाते हैं मेरे।बस इसलिए लिखती रहती हूँ। शुभरात💐💐 तस्वीर में तस्वीरें हैं .....जैसे कल्पना में कल्पनाएं😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें