कल्पनाशब्दों के बीच
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आज असमानी नल खुले हुए हैं....सुबह से बूंदे पड़ रहीं ।बाहर नह…

आज असमानी नल खुले हुए हैं....सुबह से बूंदे पड़ रहीं ।बाहर नहीं जाना था तो सोचा खुद में चलें..... शाम भर जो जी आया लिखा.... मन रोकना नहीं आता मुझे। 😊😊😊😊 *स्मृति पटल पर उस रोज़ देखी सफ़ेद कमीज़, किताब में दबा मोरपंख और एक मुड़ा पन्ना बचा है..... बाक़ी सब शेष में दर्ज़ है। *फ़लसफ़े और आंकड़े नहीं बूझ पायेगा बेचारा प्रेम निरा अनपढ़ फिलॉस्फर है *मन से मन की मन का करने की लड़ाई हो..... तुम मैं निर्दोष हूँ मेरा प्रेम दोषी है। *अवश,विवश,परवश सब प्रेम की अदृश्य क्रियाएं हैं। अवश्य शायद प्रेम की प्रतिक्रिया है। *मेरा सूरजमुखी स्वयं को झुकता मुड़ता है मैंने अपने अंधेरे अन्तरमुखी किये हुए हैं। *मन लांघना सिखा दिया तुमने.... मेरा मन हृदय- तल में ही बजता- तजता रहता है। *अथ और अथाह के बीच की शाश्वत पंक्ति है प्रेम। लिखने से समय और दुःख सिकुड़ जाते हैं मेरे।बस इसलिए लिखती रहती हूँ। शुभरात💐💐 तस्वीर में तस्वीरें हैं .....जैसे कल्पना में कल्पनाएं😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें