भाषा / Language
रात मेरी नींद का गहना
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रात मेरी नींद का गहना....
उसका गहरा होना उसका निर्ध्वनि होना उसका गहन होना उसका घुप्प होना मेरी नींद के लिए एक खूबसूरत माहौल रचता है जैसे एक मोगरे से लदा झूला ....रात रानी को पींगे देने को आतुर
अपना दिन बाँट भी दूँ....अपनी रात में सिर्फ खुद के लिए बचा कर रखती हूं। अपने श्रृंगार ...अपने प्रेम....अपने अथाह के लिए
जो किसी से नहीं कहती वो सब रात मेरे होंठों से ख़ुद चुन चुन कर कागज़ पर लिखती है। एक नाम जो सिर्फ़ वो जानती है। मैं नींद में pure कल्पना....imagination होती हूँ। मेरी रात काली साड़ी में नहीं ब्लैक में सिल्वर पोल्का डॉट्स पहन कर आती है ।उसके पल्ले में एक चेहरा बना हुआ है....
तुम उसे चाँद कह सकते हो ...सितारों से भरी रात का ।पर मैं उसे भरम कहती हूँ। बढ़ता घटता भरम।
दिन उसके उलट यथार्थ है जहां चमक ही चमक मन ही मन
काम ही काम
जरूरत ही जरूरत
इसलिए बेहद गरम
एक जद्दोजहद वो होने की जो हम एकांत में कभी नहीं होते।
पानी में लकीर ही लकीर बनाते ही जाना
अपना कौन खुरचते जाना।
दिन एक ऐसा पीला पैरहन जिसमें अनगिनत रेशे लटके हों
हर दिन के कई ...बेहद उलझे
तुम कहते हो धरती वस्त्र बदलती है पर
मुझे लगता है घरती वस्त्र हीन रहती है । सुंदर निराकार निर्दोष
मैं उसमें अपनी जरूरतों और चाहनाओं का रंग भरती हूँ।
अलग अलग कूँची से
रात दिन
शुभ रात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें