भाषा / Language
सिर्फ और सिर्फ .... तुम
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सिर्फ
और सिर्फ .... तुम
"आकाश" हो
मुझ पर रुके हुए
मुझ तक झुके हुए
बाकी सब तो "मौसम" हैं
करवट लेते हुए
सलवट देते हुए
मुझे अपने पास बुला लो दिलबर .....यहाँ साँस नहीं आ रही। पहाड़....आवाज़ दो।
राह बनाओ। मुझे आना है तुम तक।
तुम मुझे इस लिए भी पसंद हो कि बांहें फैलाये खड़े रहते हो।
बंद कमरे से भागने का पहला मौका मिलते ही आती हूँ।
मेरा इंतज़ार करना।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें