भाषा / Language
शाम भर से ये गीत कई बार सुन चुकी।
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शाम भर से ये गीत कई बार सुन चुकी।
आप भी सुनें....
उजाले की आखरी बून्द भी उजाला ही कहाती है.... अंधेरा नहीं।😊😊😊
मुस्कुराइए....कल फिर लड़ना है।
कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे
उदासी भरे दिन कभीं तो ढलेंगे
कभी सुख कभी दुख, यही ज़िंदगी हैं
ये पतझड़ का मौसम घड़ी दो घड़ी हैं (२)
नये फूल कल फिर डगर में खिलेंगे
उदासी भरे दिन कभीं तो ढलेंगे
भले तेज कितना, हवा का हो झोंका
मगर अपने मन में तू रख ये भरोसा (२)
जो बिछड़े सफ़र में तुझे फिर मिलेंगे
उदासी भरे दिन कभीं तो ढलेंगे
कहे कोई कुछ भी, मगर सच यही है
लहर प्यार की जो कभीं उठ रही है (२)
उसे एक दिन तो किनारे मिलेंगे
उदासी भरे दिन कभीं तो ढलेंगे
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें