भाषा / Language
इधर आत्मा तक को ग्रहण लगा है
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इधर आत्मा तक को ग्रहण लगा है...
कोई कुम्भ कोई पानी इसे परिष्कृत नहीं कर सकता।
ईश्वर धुल गया ।
*कोई निज़ाम को बताए कि जिसे चुना था वो लोगों को चुन चुन कर मार रहा।
लानत भेजी जा रही ।
आंसुओं और एम्बुलेंस में भर कर ....
चिताओं का धुआं किले में सुराख कर देगा। कुछ कर लो।
मर रहे लोगों का निज़ाम कब बनोगे। छलिया लग रहे ।
आप एक पीढ़ी के साथ खेल रहे। लोगों ने आप से उम्मीद छोड़ दी है पर खुद से नहीं हारेंगे।
अपने परिवार को ...अपने आसपास के लोगों को...अपने पैसे ....अपना काम बचाएं।
उसका मुँह न देखें । वो मद में है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें