भाषा / Language
दुःख तो हमेशा से ही सदाबहार रहा है
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दुःख तो हमेशा से ही सदाबहार रहा है
पर उसमें खिलने वाले फूल ....
वो फूल...
जो किसी स्त्री की देह के लिए ही खिलते हैं
निश्चित ही.... सुर्ख़ लाल रंग के होते होंगे
सटा के देखिये ...कोई भी स्त्री से लाल रंग
बेहद फबेगा ...
चाहे शरीर से रिसता हो
या ...सिंदूर सा चिपका हुआ
ये लाल फूल वाला दुःख ही है .....
जिसे धारण कर
वो अपने होने का सुख बांचती फिरती है
वो इम्तेहान देती रहती है
उस पल .....
हर माह ....
हर उम्र में
और परिणाम भी ... वो परिमाण भी
रक्त सा सुर्ख़ ही लगता है उसके दामन में
ये सुर्ख़ फूल किसी और का सुख होता तो होगा जरूर
वर्ना ...
हर मौसम
हर सदी
स्त्री खूबसूरत कैसे लग सकती है ?
वो भी...... बिना श्रृंगार
फूल किसके लिए बोझ हुए हैं भला ?
और स्त्री के लिए....
उसकी देह के लिए ....
कभी सोचना भी मत
लाल दुःख उसके वजूद में घुल गया है
उसके अंतर्मन में रिस गया है
लाल दुःख स्त्री ने अपने केश में टांक दिया है।
*अब ऐसा कुछ लिखती नहीं। memories में मिला लाल दुःख😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें