कल्पनाशब्दों के बीच
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मेरी आँखें तुम्हें तब से जानती हैं जब से हम मिले भी नहीं थे…

मेरी आँखें तुम्हें तब से जानती हैं जब से हम मिले भी नहीं थे। मैं दूर दूर तक कहीं नहीं थी। तुम पास तो क्या आस पास भी नहीं थे। जिस रोज़ पहली बार तुम्हारी तस्वीर देखी उसी रोज़ कुछ चटका। आँखें पसंद तो काफ़ी कुछ करती ही रहती है पर उँगली नहीं धरती। मुझे याद है मैंने उंगलियों से तुम्हारे आसपास एक घेरा बनाया और खुद से कहा....ये चाहिए। चाहिए ....चाहना में परिवर्तित होती गयी। मैं ढूंढेने लगी।तलाश कई फूल पत्तियों, चाँद आकाश, दूर पास में न मिलकर शब्दों में लिपटी मिलने लगी। उस रोज से मैं पढ़ने लगी। एक कल्पना लोक रचने लगी। लिखने लगी। एक पन्ना रोज़ जैसे एक सिक्के को डाल कर गुल्लक भरता हो कोई। लिख कर वैसे भी पूर्ण कौन हुआ है भला? गुल्लक कभी नहीं भरी। मैं .... थोड़ा थोड़ा घट गई । सूखी डाल , सूखे फूल,सूखे पत्ते सब झड़ते रहे । एक पेड़ रोज़ ठूंठ होकर नया हो जाता हो जैसे बार बार बस हरा कहना सीख रहा हो जैसे **रंग ... तुम सिर्फ़ ...... एक मुझमें दिल की जगह है तू शुभ रात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें