कल्पनाशब्दों के बीच
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अगर माँगने से एक बूंद भी स्नेह की पड़ जाती है मुझ पर तो मैं…

*अगर माँगने से एक बूंद भी स्नेह की पड़ जाती है मुझ पर तो मैं राह ताकने से बेहतर है तुमसे हर बार वो बून्द माँगना पसंद करूँगी। दरवाज़ा है ... कोई तो दस्तक देगा ही... तो मैं क्यूँ नहीं? दहलीज़ तो एक ही है इस तरफ या उस तरफ मैं प्रेम में अलग तरह की स्वार्थी हूँ। बेहद स्वार्थी अपने लिए तो हर हद तक * मंज़िल नहीं सफ़र की आरज़ू है। मैंने प्रेम से ज़्यादा प्रेम के सफ़र को जिया है। तुम तो मेरी थकान के बाद की सुस्ती हो। सुबह💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें