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रचना 2594

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जब दो पहाड़ी नदियां मिले तो समंदर तो उमड़ना ही था

जब दो पहाड़ी नदियां मिले तो समंदर तो उमड़ना ही था.... आज शाम अचानक एक प्यारी सी आवाज़ ने call किया । number saved नहीं था तो पहचान नहीं पाई। दूसरी तरफ की आवाज़ में इतनी ज्यादा कशिश इतनी सारी हँसी बंधी थी कि लगा कौन इतना प्रेमिल मुझसे बोल रहा। जैसे ही उसने जादूगरनी कहा... मैं समझ गयी ये रुचि बहुगुणा उनियाल ही है। फटाफट फ़ोन काटा और कहा रुको wapp वीडियो कॉल कर रही। मुझे उनकी हँसी की रंगत देखनी थी। कितनी निश्छल कितनी प्यारी सूरत। उनको देखते ही जाने क्यों आँखे छलक आयी। दोनों की रोती तस्वीरें रुचि ने अभी भेजी। जाने क्या बंधन है जो इस तरह छलक आया। दोनों की आवाज़ में खनक एक जैसी आंखों में चमक एक जैसी। पहली बार मिले और ऐसे मिले कि अब तक उसकी हँसी कानों में गूंज रही। कुछ लोग खरा मन रखते हैं बस वही मेरे दिल को छू जाते हैं ।मेरी आँखें उन्हें पहचान लेती हैं। तुम बहुत प्यारी हो। और इस तरह जो तुम्हारे साथ खनकी हूँ कुछ देर....मुद्दत हो गई थी मचले हुए। पारदर्शी रुचि तुम्हारी हँसी कायम रहे। हँसती हुई औरतें इस धरती की नेमतें हैं। हमेशा रहना 💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें