कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2585

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हर दरख़्त उदासी के फूलों से लदा हुआ है।

*हर दरख़्त उदासी के फूलों से लदा हुआ है। यहाँ कोई अपना मौसम किसी को नहीं बताता । सब कयास लगाते हैं *सबका एक निज एक निजी और एक निजी ईश्वर होता है। हम अपने आने जाने और जाने आने वाले रास्तों को खूब पहचानते हैं। *लिखने ने मुझे कहना सिखाया .... कहा हुआ लिख कर हर बार उदासी से सन गया। *बाहर से भीतर और भीतर से और भीतर जाने वाले सारे रास्ते बंद हैं। सब में उदासी जम गई है। निरी सफ़ेद *उदासी का ठौर प्रेम ही है।खुरच कर देखो हृदयलिपि उस पर तुम्हारा शहर मिलेगा। और मेरी मौन पदचाप *शुभरात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें