भाषा / Language
प्रेम तह कर रख रही हूँ रोज़
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प्रेम तह कर रख रही हूँ रोज़
मन
मन से किताब
किताब से दराज़
दराज़ से अलमारी
अलमारी से घर
घर से शहर
सब कुछ भर गए हैं.....
कंठ तक
"धूप का पंख" ला दो
उदासी झलनी है
*सुशोभित जी के इन दो पन्नों से मुझे लय और लौ दोनों मिली। किताब सिरहाने से बुक सेल्फ में पहुंच गई है। पर ये दो पन्ने खुद में टांक लिए हैं😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें