कल्पनाशब्दों के बीच
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तुम सुंदर ही इस लिए हो कि प्रेम को प्रेमी से ज्यादा बेबाक़ी…

*तुम सुंदर ही इस लिए हो कि प्रेम को प्रेमी से ज्यादा बेबाक़ी से लिखती हो। अगर कल्पना से प्रेम न हुआ होता तो मैं उसी कल्पना के फेर में पड़ा रहता...... उसने कहा उफ्फ़...जाने दो जाने दो ... बेबाक़ी को बाक़ी ही रखो बे 😊😊 कम से कम आज के दिन मेरा नुकसान न कीजिये वैलेंटाइन डे जैसा कुछ होता नहीं पर आज वो दिन है। हम कल ही मना आये😊😊😊 विनोद को तस्वीरों से कुछ खास लगाव नहीं। बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें