कल्पनाशब्दों के बीच
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Fb हमेशा मेरे लिए दर्ज़ करने की डायरी सा रहा।

Fb हमेशा मेरे लिए दर्ज़ करने की डायरी सा रहा। हमेशा लगा खुशियों को ,प्रेम को, खुद को ,कल्पना को और तुमको लिखा जाना चाहिए। वैसे तुमको और खुद को नहीं .... मैंने ज्यादातर हमको लिखा। यहां मिलने मिलाने के सिलसिले में कई दोस्त, कई साथी, कई अजनबी ,कई कुछ भी नहीं रहे । कई दोस्तों को वक़्त ने खुद छाँटकर 'कुछ दोस्त " कर दिया। उन कुछ को पढ़ने के लिए यहां हूँ।लिखा कीजिये। दूसरों की वाल का कम फेरा देती हूँ तो लोग भी कम ही देर साथ रखते हैं। धीरे धीरे काफ़ी छूट गए। छूट गए कहना गलत होगा...नए में रम गए कहना ज्यादा सही। Fb पर ही लिखा ....कभी सोचा नहीं कि क्या पा रही हूँ। कभी खुश हुई तो लौटी यहाँ उदास हुई तो उड़ भी गयी । पहले पहल डर के लिखा कि सही है या गलत ? फिर धीरे धीरे कम कम में लिखने लगी .. ज्यादा ज्यादा प्रेम बिना डरे प्रेम लिखो तो प्रेमी मन ही मिलते हैं।खूब मिले । खूब सराहा । मेरी शर्तों को मान कर मुझे मान दिया। संग मुस्कुराए ...ऊल जलूल बातों पर भी। दोस्त लिखा हुआ मेरे नाम से टैग करते हैं या दिल भेजते हैं तो लगता है क्या खूब जिया प्रेम मैंने। जो लिखा कम ही सहेजा.... तुम से कहा और जो कह दिया वो फिर कैसे कहा जा सकेगा ।इस लिए हर रोज़ फिर कुछ कहा तुमसे। ज़रिया और पुल दो खूबसूरत शब्द हैं।fb वही रहा .... कहने का मन बचा रहे । fb उदासीन होता जा रहा। एक दिन ये भी बचा नहीं रहेगा। लिखा ... भूल गए। तस्वीर लगाई ....खो दी। पढ़ा... मुस्कुरा दिए। तुम्हारा चेहरा बचा कर रखूँगी ...हमेशा शब्दों में कल्पना और क्या करेगी?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें