भाषा / Language
यकीनन फूल रिश्तों की तरह होते हैं।
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यकीनन फूल रिश्तों की तरह होते हैं।
खिलते हैं ...मुरझाते हैं
बस अंतर यही है कि फूल मौसम से बंधे हैं ।
रिश्तों के रूठने ,टूटने और मनाने का कोई मौसम नहीं होता।
फूल मुरझा जाए तो केवल दरख़्त रुआंसा होता है।
रिश्ते मुरझाने लगे तो उस से लिपटे कई और रिश्ते सूखने लगते हैं ।
सूखे फूलों का मोल फिर भी है... ज़मीन में मिलकर उर्वरक हो जाते हैं।
मुरझाए सूखे रिश्ते हमेशा के लिए बंजर कहलाते हैं।
बहुत पास से देखो या बहुत दूर से फूलों के पास नेमत होती है लुभाने की...
रिश्तों में दूर पास शुरुवात है चुभने चुभाने की
सूखे फूल किताब में और सूखे रिश्ते कविता में इस लिए भी रखे जातें हैं कि महक ज़िंदा रहे।
अनंत रिश्ता और रिश्ते का अंत दोनों फूलों का मुँह देखते हैं
फूल कितने मासूम रिश्तों में बंधा है।
फूल न बोल कर भी रिश्ता कायम रख लेते हैं...
अबोला रिश्ता सूखे फूल सा हो जाता है।
एक रिश्ता कई रंग... कई फूलों की महक सँजो सकता है।
एक फूल सिर्फ़ अपना रंग और अपनी खुश्बू से रिश्ता बनाये रहता है।
आप फूलों तक आते-जाते हैं....बिना रिश्ते के
रिश्ते भी आने जाने से फूल जैसे रहते हैं।
शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें