कल्पनाशब्दों के बीच
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नए किनारे पर ढ़ेर सारी धूप रोकी है।

नए किनारे पर ढ़ेर सारी धूप रोकी है। पुराने सभी मोड़ अंधेरों में धकेल आई हूँ। आओ तुम्हें नई उम्मीद का निवाला खिलाऊँ.... चख कर देखो ....खुशी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें