कल्पनाशब्दों के बीच
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तुम अपनी तस्वीर क्यों लगाती हो कल्पना

तुम अपनी तस्वीर क्यों लगाती हो कल्पना? आत्म मुग्धा हो? किसी और की लगाउंगी तो तुम क्या कहोगे? तुम्हारी लगाउंगी तो सब क्या कहेंगे ? सब की लगाउंगी तो जाने कौन क्या क्या कहेगा? दो की लगाउंगी तो तीसरा चौथा और पांचवा क्या क्या सोच लेगा? हम दोनों की लगाउंगी तो मैं कब नज़र आऊंगी? किसी की भी लगाऊंगी तो उसे क्या पता चलेगा ? पता चल गया तो शुकराना और देना होगा। बेहतर है एक ही शक्ल को रंग और रंगत में डुबोये रखो। पल जियो...क़ैद करो...उड़ा दो। अपनी तस्वीर से कोई प्रश्न कोई उत्तर कोई नाराज़गी की दरकार नहीं रहती। इस लिए कल्पना..... बस कल्पना
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें