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रचना 2443

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मैं किसी से नहीं कहूँगी अपने दुःख

मैं किसी से नहीं कहूँगी अपने दुःख मैं नहीं बाटूंगी अपनी सिसकियां मैं चीख लूँगी अपनी शिकवे एक गहरे कुँए में मैं डुबो दूँगी सारे आँसू समुंदर की गहराई में लहरें उन्हें दूर ले जाएगी भनक नहीं लगने दूँगी मैं किसी उदासी की मेरे दुःख शिफ़ा होकर रहेंगे। जिसे.... बस मेरे होंठ चखेंगे कान सुनेंगे और आंख देख पाएंगी। मैं उन्हें हृदय में उम्रकैद दूँगी मेरे दुःख की कोई खुश्बू न होगी न कोई आहट मैं तय करूँगी अपना सैयाद मैं खुद खोलूंगी अपनी गिरह मैं फेर लूँगी अपना मन मैं माफ़ कर दूंगी मैं हर उत्तर हँस कर दूंगी मेरे दुःख का रंग पारदर्शी रहेगा आजमाएं.... मैं साम्राज्ञी बन कर रहूँगी हर दुःख की सिर्फ प्रेम मेरा वज्र पात करेगा *fb स्क्रोल करते वक़्त magnificient century के एक एपिसोड में हुर्रेम की मन की व्यथा देखी....उसकी आँखों में दिखा दुख लिखा गया।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें