कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2413

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मैं यहां अब ऐसी हूँ

मैं यहां अब ऐसी हूँ .... तुम वहां अभी कैसे हो? पहाड़ी सुबह रुकती नहीं....रेत की तरह मुठ्ठी से फिसलती जाती है।😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें