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पहाड़ पर मेरा घर पेड़ों के आसपास बना है ।घर की ओर जाने वाला र…
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पहाड़ पर मेरा घर पेड़ों के आसपास बना है ।घर की ओर जाने वाला रास्ता ,आंगन, ऊपर छत की ओर जाता रास्ता, छत सब पेड़ों से ढंके हैं। ऐसे लगता है छोटे से बाग के बीचों बीच घर है।
पेड़ हैं तो पत्ते भी गिरते हैं।सुबह सुबह आँगन बुहारना अच्छा लगता है। सूखे फूल पत्ते दिन भर पेड़ों से गिरते रहते हैं। सुबह अपने headphone पर वही playlist चला कर इन सूखे फूलों पत्तों को बुहारती हूँ।पता नहीं क्या आनंद आता है। लगता है कुछ नया मुझमें खिलने को है। कुछ पुराना सूख कर रोज़ बीत जाता है।
ऊपर हरे पत्तों और नीचे भूरे पत्तों के बीच मैं खुद को तरो ताज़ा महसूस करती हूँ। भूरे पत्ते बुहार कर इकट्ठा करती हूँ तो लगता है अपना हरियल होना तय कर रही।
मन सुकून मय लगता है।
नए भूरे पत्ते कल फिर गिरेंगे
कल फिर कल्पना हरी होगी।
एक मासूम चाहना और ...
फिर और ...फिर और कहेगी।
शुभरात💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें