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रचना 2310

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अब ये दिल दे भी दो

अब ये दिल दे भी दो इसे सीने में रखूं इस बेज़ार ज़िन्दगी को इक जीने की वजह दूं आज मुझे ये कह जाने दो रखो न पलकों नज़रों में गाओ न नज़मों ग़ज़लों में अहसासों में घर बनाओ लकीरों में वो जगह दिखाओ आज मुझे यहाँ रह जाने दो ना रिश्तों में बांधो , ना वादों में बांधो ना यादों इरादों में हूँ मैं रेत , मैं आज पानी हूँ आज मुझे यूँ बह जाने दो चाहा तुझे तुझे ही पाया ख्वाब नहीं तू सरमाया आंच में पिघलती मोम हूँ डूबा रह ,मैं व्योम हूँ आज मुझे बस ढह जाने दो कह जाने दो ,रह जाने दो बह जाने दो ,ढह जाने दो बहुत देर हो गयी ख्वाबों छोड़ो मुझे अब घर जाने दो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें