कल्पनाशब्दों के बीच
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कुछ लिखा.....कुछ जिया😊

कुछ लिखा.....कुछ जिया😊 * ऐसी कई शामें चुरा कर रख देती हूँ परे ..... जब तुम होते - होते होते ही चले जाते हो मुझमें *वो हमेशा कहता है... हम भरने के लिए नहीं ख़ाली होने के लिए बने हैं। उसकी ऐसी बातें जो मुझे स्पर्श करती हैं उसकी लिपि चाहे बन गयी हो....पर मुझे यकीन है उसकी वाली अनुभूति बन ही नहीं सकती। मैं खुद उस तक पहुंचने की जद्दोजहद में लगी रहती हूँ। *क्योंकि और किसी से ज्यादा बात नहीं होती..... मैं तुम्हारे साथ बिना मिले बोल बोल कर दिन गुज़ार लेती हूँ.... ये कागज़ ही मेरा अदृश्य प्रेमी है। शुभ रात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें