कल्पनाशब्दों के बीच
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एक रोज़ बागी होना चाहूँगी

*एक रोज़ बागी होना चाहूँगी.... मैंने कल्पना के कानों में मुस्कुराते हुए कहा.....तुम देखना😊😊😊 *ज़िन्दगी की बेदर्दी लिखो तो कागज़ वाह - वाह करने लगता है। *तन और मन दो अलग किस्म के प्रेमी हैं । एक ज़िद्द है एक ज़िद्दी *दो चुप लोगों के बीच प्रेम बोलता है। *मैं लोगों के साथ अकेली हो जाती हूँ ... और तुम्हारे साथ पूरा शहर ये दोष प्रेम का है। *मेरे पास अनगिनत दिल हैं... सबके लिए बस मन एक है। वो तुम्हारा रहेगा *तस्वीर अभी की है ....काम धाम कुछ है नहीं .. ख़ब्त जारी है।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें