भाषा / Language
आदमी इस लिए भी बीमार है
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आदमी इस लिए भी बीमार है
कि खुद, खुद से एक दीवार है।
हाँ - ना का खेल है ही नहीं अब
शतरंज जैसा इश्क़ एक हार है
सूखे पत्ते पर ओस को टिकाना
थामना भी तो मेरा एक प्यार है
ज़िन्दगी पत्थरों से टिकी रहती
रिसना तो सबका एक गुबार है
फ़िज़ूल उदासी के मौसम न बुन
पतझड़ तो प्रेम की एक बहार है
दिन छोटे ,रातें उससे भी छोटी
औरत बिन बोझ एक कहार है
*उड़ते ख़्याल ...सुबह फूलों से बातें
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें