भाषा / Language
जितनी बार लौटी हूँ अपनी तरफ
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जितनी बार लौटी हूँ अपनी तरफ .......
इक नया दिन .....सिला है अपने लिए
इक पुरानी रात ....उधेड़ी है सबके लिए
इस लिए मुझे ...."विराम" पहनना पसंद नहीं .....
सब्र बचा रहे मुझमें....
प्रेम मैं खुद बचा लूँगी।
आदरणीय Harishankar Balothia जी की कृति को समर्पित मेरे शब्द
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें