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रचना 2216

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रोज़ दुआओं में मिल लेते हैं हम दोनों

रोज़ दुआओं में मिल लेते हैं हम दोनों.... मुलाक़ात का वक़्त मुक़र्रर नहीं रखते। तुझे याद कर लिया है... ये कह कर तुम तक जाने कितनी बार पहुँचा जा सकता है। हर बेरुख़ी से नाराज़ क्या हो जाना। उसे प्रेम में तब्दील कर के देखो डूबे रहोगे इबादत में
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें