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रचना 2194

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पूरा दिन बिता कर रात तक तुम तक पहुंच ही जाती हूँ।

*पूरा दिन बिता कर रात तक तुम तक पहुंच ही जाती हूँ। तुम मेरी पृथ्वी का आख़री और शुरुआती कोना हो। *तुम मुस्कुराते हो तो कई चेहरों पर फूल खिलते हैं.... मेरे चेहरे पर सुबह उग आती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें