एक रोज़ तुम मुझ पर सच उगाना और मैं तुम पर से झूठ तोड़ लूंगी। ये हरश्रृंगार..... रुके रहेंगे न तब तक?
रचना 218118 सितंबर 2020भाषा / Languageहिन्दीEnglishएक रोज़ तुम मुझ पर सच उगाना और मैं तुम पर से झूठ तोड़ लूंगी।✦एक रोज़ तुम मुझ पर सच उगाना और मैं तुम पर से झूठ तोड़ लूंगी। ये हरश्रृंगार..... रुके रहेंगे न तब तक?कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें