कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2164

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माँ को बेटी का संदेशा

माँ को बेटी का संदेशा..... मेरी माँ की हमेशा से यह एक शिकायत रही है की मैंने उनके लिए आजतक कुछ लिखा नहीं I शिकायत जायज़ भी है क्योंकि जब-जब मैं वास्तव में वक्त का पहिया घुमाकर अपने बीते हुए कल की ओर नज़र डालती हूँ , तो मुझे कोई ऐसा ख़ास अवसर याद नहीं आता जब मैंने अपनी माँ के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त की हो या कहा हो -" थैंक यू" I इस अमेज़न और फ्लिपकार्ट, इंस्टा और फेसबुक ,फूल और केक के ज़माने में ,आज मैं अपनी माँ को उनकी मनपसंद चीज़ देने जा रही हूँ - शब्द I क्योंकि माँ ने ही सिखाया है, जहां सब धुंधला हो जाता है, सिर्फ 'शब्द' ही हैं जो ठहरे रहते हैं I तो यह एक लेख , मेरी माँ के नाम I  जहाँ लोग अक्सर अपने नाम से नाखुश होते हैं, वहां मेरे नाना नानी ने बिना किसी विरोधाभास की गुंजाइश के मेरी माँ का नाम कल्पना रखा I पेशे से तो माँ एक अध्यापिका हैं और पिछले 23 सालों से केंद्रीय विद्यालय संगठन के ज़रिये न जानें कितने बच्चों का भविष्य उज्जवल करती आयी हैं पर ठीक अपने नाम की ही तरह, माँ की कोई सीमा नहीं है I तो उठा ली कलम और लिखना शुरू कर दिया I शौक धीरे धीरे जूनून बन गया I खूब सारी प्रतिष्ठा पाई। यही एक कारण है कि मैंने आजतक माँ के बारे में नहीं लिखा I शर्म की बात है पर , अब हिंदी तो इतनी अच्छी रही है नहीं और कहीं तुलना हो गयी तो खामखा मेरी कमियों की प्रदर्शनी लग जाती I पर माँ ने प्रतिष्ठा या सामाजिक स्वीकृति के लिए कभी नहीं लिखा I प्यार ...सिर्फ़ लोगों का प्यार पाने के लिए माँ लिखती गयी और देखते ही देखते घर की चार दीवारी के बाहर अपना ही एक छोटा सा परिवार बना लिया। मैंने अपनी माँ को हर रूप में सक्षम होते देखा है I मुझे आज भी याद है जब मेरी दादी अपनी आखरी सांसें गिन रही थी, मेरी माँ ने बिना कुछ सोचे छः महीने की चाइल्ड केयर लीव लेकर मेरी दादी की बिलकुल एक बच्चे की तरह सेवा की I मेरे मामा की तो नाना नानी से आजीवन नाराज़गी रही की दोनों बच्चो में माँ हमेशा उनको ज़्यादा प्यारी रही I क्रिसमस से पहले एक शाम फ्रिज में केक रखा देखा तो पता चला निर्मला आंटी ने दिया है I निर्मला आंटी न जाने कितने सालों से हमारे स्कूल में सफाई का काम करती हैं I बिना किसी झिझक अगर एक प्रधानाध्यपिका अपने ही स्कूल की सेविका के हाथ का बना केक खा लेती है और फिर, तस्वीर भी खिंचवाती है तो वह बस मेरी माँ हो सकती है I ज़ूम पर माँ ने वह सब कर दिखाया जो प्रत्यक्ष रूप से अन्य अध्यापक क्लास में मौजूद होकर नहीं कर पाते I सच कहूँ ? सरकारी नौकरी को सरल समझने वालों को मेरी माँ की ज़िन्दगी का एक दिन देखना चाहिए I तो यह कहना गलत नहीं होगा कि माँ ने इंग्लिश में भाषण देना भी सीखा और रसोई में गोल रोटी बनाना भी I माँ वैभव लक्ष्मी व्रत भी रखती है और जीन्स टॉप पहनकर सात समुन्दर पार ऑस्ट्रेलिया भी घूम आती है I शायद ऐसा ही है कुछ माँ का 'फेमिनिज्म' ! और यह ही नहीं, परंपरा आगे बढ़ाते हुए हूबहू एक एक चीज़ मुझे भी सिखाई और जो नहीं सिखाई, वह न जाने कैसे खुद बा खुद मुझमें उत्पन्न होती गयी I फिर चाहे वह लिखना ही क्यों न हो I मेरी माँ का जीवन कोई फूलों से लदे कालीन पर एक लम्बी सैर नहीं रहा I सबका चहेता बनने के इस सफर में माँ ने काफी कुछ खोया भी। अपने सपने खोयेI ज़्यादा न चुनते हुए कई बार कम को चुना I दिल के ऊपर दिमाग को रखा I न जाने कितनी बार अपना मन भी मारा I और यह सब किया , हँसते -हँसते I परिस्थितियां बदली , लोग बदले , समय बदला अगर कुछ स्थिर रही , वह है माँ की मुस्कान I हर मुसीबत या मसला, फिर चाहे पारिवारिक हो या सामाजिक, काम से सम्बंधित हो या आर्थिक माँ हर पड़ाव पार करते करते यहां तक पहुंच गयी I मुझे यह कहने में कोई शर्म का आभास नहीं होता कि जो त्याग और समझौते मेरी माँ ने अपनी ज़िन्दगी में किये, वह मैं नहीं करुँगी I शायद इतनी हिम्मत नहीं है मुझे I ना ही इतनी निस्वार्थ हूँ I पर हाँ, इस वर्ष मैं 20 वर्ष की हो जाउंगी और इन 20 वर्षो में मैंने जो भी कुछ छोटा मोटा हासिल किया है और जो भी कुछ आगे आने वाले समय में करुँगी ,वह सब मेरी माँ के लिए होगा। आज से एक साल पहले जब मुझे मेरे सपने पूरे करने थे, तब लोगों कि न सुनते हुए माँ ने यह तक कह दिया कि अगर उन्हें अपने गहने बेचने पड़े, वह भी सही पर मुझे अपने सपने पूरे करने कि आज़ादी है I मेरे सपने पूरे होने में माँ का क्या स्वार्थ ? अब समझ आता है कि दरअसल मेरा हर सपना जो पूरा होगा, वह माँ का कई साल पीछे छूट गया अधूरा सपना होगा I जहाँ माँ जैसा बनना मेरी चाहत थी , माँ तो कब का खुद को मुझमें देख चुकी थी I तो आज यह लेख लिखते लिखते एक और बात पता चली माँ की - माँ ज़रा स्वार्थी भी है I जैसी भी है, शब्दों में पिरोई जाए इतनी आसान नहीं है और यह मैंने देख लिया I यह रहा दूसरा और आखरी कारण माँ पर न लिखने का I शब्द भावनाओं के साथ न्याय नहीं करते I एक संघर्ष का दरिया है जिसमें 'मुस्कुराते' हुए जाना है I बस आखिर में इतना ही कहूँगी, मैंने अपने पिता से बहुत कुछ सीखा है पर सीखते कैसे हैं, यह मैंने अपनी माँ से सीखा है I जन्मदिन मुबारक माँ ! - भव्या
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें