भाषा / Language
मुट्ठी भर
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मुट्ठी भर....
आरज़ू वाले लम्हे
तुम्हारी जुस्तजू वाले लम्हे
बटोरे और ....
खुद में बो लिए
अब ....
लम्हों का दरख़्त हूँ मैं
अब खुद लम्हा नहीं ....
वक़्त ही वक़्त हूँ मैं
तुम्हारे नाम का
हर शाख पर तुम ....
हर पात पर तुम .....
हर लफ्ज़ में तुम
हर बात में तुम
फूल कलियाँ .....
सब तुम्हारे नाम की
अब .....
पल नहीं रहे तुम
हो लम्हों की लड़ियाँ .....
दिन रात सुबह शाम की
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें