भाषा / Language
मायने बेमायने कौन होते हैं कल्पना ? कैसे तय करती हो? उसने पूछा
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*मायने बेमायने कौन होते हैं कल्पना ? कैसे तय करती हो? उसने पूछा
*आसान है... मैंने कहा
आँखें मूंद कर दोनों बाहें फैला देती हूँ...मेरे आसपास एक अदृश्य परिधि महसूस होती है।जो जो इस परिधि में मुझसे मिलने बार बार आता है या मैं उसे आने देती हूँ वो मेरे लिए मायने है।
*फिर बेमायने वे सब जो परिधि के उस तरफ़ वाले हुए?
*ना ... बेमायने तो मैं खुद हूँ जब जब अपने मन के लिए अपनी परिधि छोड़ देती हूँ।उस एक की ओर बढ़ जाती हूँ।
*तो फिर बाक़ी लोग कौन हैं ?
*खुद ही तो कहा तुमने अभी...
लोग...
वो लोग
मायने - बेमायने से परे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें