कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2084

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यकीन मानिए मुझे कुटिलता की पहचान नहीं

यकीन मानिए मुझे कुटिलता की पहचान नहीं... शायद इसलिए मुझे दूसरों में वो दिखती भी नहीं.... दिव्य दृष्टि मिली ही नहीं मुझे। मुझसे शब्दों के भीतर छिपे शब्द भी पढ़े नहीं जाते। बुद्धू हूँ हमेशा से। दूजी परेशानी ये भी है कि मैं बहुत जल्दी भूल जाती हूँ ।पिछला उदास दिन याद नहीं रहता.... हुनर माफ़ी मेरा फ़क्र है। इधर समंदर में लंगर नहीं सब्र पड़ा है।डूबी रहती हूँ खुद में। मैं अपनी तरह की सुंदर हूँ... ऐसी ही रहूँगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें