कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 2070

भाषा / Language

अदृश्य मेरा वो

अदृश्य मेरा वो .... *है कोई वो मुझमें अदृश्य ...जिसका कसा हुआ पाश मुझे जाने नहीं देता । *है कोई वो मुझमें अदृश्य... जो थाम कर मुझे स्वप्नलोक में धकेल आया और कर दिया मुझे बेघर हमेशा के लिए । *है कोई वो मुझमें अदृश्य जिसका चेहरा इस वक़्त नींद से बस कुछ पल पहले वाला क्षण सा अनछुआ है। *है कोई वो मुझमें अदृश्य जो हर मिठास मुझमें घोल देगा ...एक बाज़ीगर जिसका मेरी रूह पर कब्ज़ा है। *कोई सुंदरता मुझे फांस नहीं सकती जैसी कि उसकी अनुपस्थिति । उसका न होना भी सुंदर है .... मेरे चेहरे पर दमकता है। तुम हो। अदृश्य पर ....मुझमें हो मेरे हर दृश्य में भी...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें