कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2044

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अगर ना मिली होती तुमसे तो शायद अनजान ही रह जाती खुद से

अगर ना मिली होती तुमसे तो शायद अनजान ही रह जाती खुद से... ये न लिखा जा सकने वाला प्रेम कितना होता है? साल शायद 2016 रहा होगा ।तब से नज़र रुक गयी है। बहुत कहा..... रोज़ ही कहती रही हूँ। इधर कुछ दिन से एक रोज़ कुछ कहा फिर जैसे कहने की इच्छा ही नहीं रही। कुछ बाक़ी न बचा।अब बस सुनने का मन है ....जो सिर्फ़ मेरे हिस्से में हो। बस गुम हो जाने का मन...इतने दिनों तक जहां पहुंचना था शायद उधर ही हूँ। अब मगन रहना चाहती हूँ...देर तक बस वहीं। इन बीते बरसों में जो खोया पाया उससे मिलने का मन बना है। पीछे मुड़ कर जाना एक बहुत खूबसूरत बात होगी ।जाकर आती हूँ... मैं खुद अपने इंतजार में हूँ जाने कब से....बस उसी का चेहरा देखने का मन है । हम दोनों ने अपने अपने हिस्से का अप्रेम आपस में बदल लिया है । एक शांत नदी हमारे बीच पुल हो चुकी है। खुद से बातें करना कितना दिलकश है। तुम मेरी favourite हो ... हमेशा से मुहब्बत देर से नहीं की तुमसे.... मैं शायद खुद से ही बहुत देर से मिली हूँ... यहीं हूँ....पर यहाँ नहीं हूँ। फिर मिलूंगी.... *मेरे हिस्से का इंतज़ार मेरा है ....बचा कर रखना 😊😊😊😊😊 आकर ले लूँगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें