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रचना 2038

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स्त्री को समाज ने बस दो ही घात दिए हैं....व्यथा और प्रथा।

स्त्री को समाज ने बस दो ही घात दिए हैं....व्यथा और प्रथा। कितनी भी ढंकी रहे स्त्री जिसका दुर्भाग्य खुला हुआ हो उसे कहां कोई बचा सका है...सिवाय उसके खुद के । इसी ताने बाने पर लिखी गयी एक बेहद सादगी से कई प्रश्न उठाती कहानी है "काले मेघा"। स्वार्थी तेजपाल और निडर तुलसी के बीच के एक तरफ़ा युद्ध की। स्त्री सुंदर, संयत और सुशील हो पर साथ गरीब हो तो हर दिन एक लड़ाई लड़ती है। कई बार तो जीत भी लेती है पर कुछ कुटिल मन उसे सामाजिक कुरीतियों में लपेट कर खा ही जाते हैं। समाज का डर उसे ज्यादा मार देता है। पँजे दिखाते दिखाते एक रोज़ अपने ही परिवार के लिए स्त्री घुटने टेक देती है। यह दृश्य जब तुलसी मिट रही होती है खूब हृदय विदारक है। गाँव इस समय सबसे निरीह और बेचारा लगा। निश्चिन्तता इस बात की रही कि उसका पति इंदर उसका संबल रहा । कहानी का अंत तुलसी और इंदर ने लिखा और बेहद सार्थक लिखा। काले मेघा को हवा नहीं तुलसी जैसी स्वाभिमानी नदी का वेग बहा ले गया। तुलसी नाम सार्थक रखा गया है... स्त्री से बड़ी कोई तुलसी नहीं हो सकती...चाहे गाँव के भीतर या घर आंगन के बाहर। श्री प्रकाश मिश्र जी आपकी किताब काले मेघा की पहली कहानी "काले मेघा" पर कुछ इस तरह रुक गया मेरा मन। मिलती हूँ अगली कहानी के साथ😊😊 Shri Prakash Mishra जी💐💐💐
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