भाषा / Language
हम बच्चों से जीत नहीं सकते
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हम बच्चों से जीत नहीं सकते....
दो दिन से दक्षु मेरे पीछे पड़ा है कि माँ इस बार हरेले में डिकारे बनाने हैं। मैंने सोचा मान जाएगा तो शिव पार्वती गणेश की मूर्ति दे दी ।कहा यही रख लेना हरेले में।
पर वो कहां मानने वाला था।कल चाचा के साथ जाकर मिट्टी ले आया। आज सुबह से जान खा गया इसे गुंथो।मुझे डिकारे बनाने हैं। बाकायदा मिट्टी कैसे गूँथनी है का वीडियो मुझे भेजा गया । मरती क्या न करती । मिट्टी में टिश्यू और रुई भीगा कर गूंथ कर जब रख दी तब उसे चैन आया। अब तक मुंह फूल कर गुब्बारा हो चुका था उसका।
फिर शुरू हुआ डिकारे यानि शिव पार्वती और गणेश जी बनाने का सिलसिला।
उसकी तन्मयता देखते ही बन रही थी। माँ का तो काम ही होता है पिघलना... लग गयी उसकी मंशा पूरी करने में।दोनों ने मिलकर डिकारे बना ही दिए। पहली कोशिश थी तो बहुत उत्साहित है। बनने के बाद चाचा के घर ले गया है कि चाची उसे पेंट करेगी। ये पहले से करारनामा हो चुका था कि चाची उसे फिनिशिंग टच देगी।
क्या बना ? कैसे बना वो तस्वीरों में है। खुशी बस इस बात की है कि पहाड़ी परंपरा को सीखने का मन बनाया उसने।
त्योहार परसों हैं । हरेला बोया जा चुका है। मन इस लिए भी खुश है कि आज की दोपहर क्लास से पहले ईश्वर के साथ बीती।
विनोद हम दोनों की तारीफ़ करते करते मंद मंद मुस्कुरा रहे।
दक्षु की जिद्द .... ज़िन्दाबाद।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें