भाषा / Language
नक्श नहीं बदल सकती थी मैं
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नक्श नहीं बदल सकती थी मैं
ना ही रूप
ना ये रंग
पर मैं मन बदल सकती थी
अलग अलग शेड्स वाले
रोज़ पसंदीदा मन पहनती हूँ
जो कभी माथे पर....
कभी होंठों के दोनों कोनों पर बिंदी बन जाता है।
कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें