कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1961

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पिता वो है जो गुंजाइश शब्द की गुल्लक को हँस हँस कर खनखनाता…

पिता वो है जो गुंजाइश शब्द की गुल्लक को हँस हँस कर खनखनाता रहता है। खुद सबके लिए आगे दौड़ता है और अपने को पीछे धकेल देता है। घर में उसके घुसने से पहले जरूरतें घुस जाती है और वो रोज़ खुद से बेदखल रहता है। हमारी आँख में सपने बोता है और खुद धूप,पानी , मिट्टी बन जाता है। पिता संसार का सबसे हरा वृक्ष है और सबसे मजबूत पुल भी। *ईश्वर मन में रहते हैं पर कभी कभी साथ हाथ पकड़े खड़े भी रहते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें