कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1945

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अगर किसी रोज़ ज़िन्दगी मिल गयी तो कैसे पहचानोगी कल्पना

अगर किसी रोज़ ज़िन्दगी मिल गयी तो कैसे पहचानोगी कल्पना? थोड़ा ट्रिकी है.... पर छू कर देखूंगी...अगर उसका नुक़्ता चुभेगा तो यकीनन ज़िन्दगी होगी और अगर ना चुभा तो? तो obviously "अहा ज़िन्दगी" होगी बुद्धू! *तस्वीर kc जी की किताब बातें बेवजह की तीसरी कविता है जिसे आज से मैं एक बार फिर पढ़ रही। अपने अंदाज में...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें