कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 1943

भाषा / Language

तस्वीर सुंदर है तुम्हारी

तस्वीर सुंदर है तुम्हारी ..... ये कैसे जाना? तुमने edit नहीं की ना बस ....इसलिए। जरूरत नहीं समझी । क्यों ? क्योंकि तुम शब्दों और रंगों की पहचान रखते हो। तुम्हारे सामने कोई यवनिका काम नहीं करेगी और ना ही कोई filters. अच्छा कहो... ज़िन्दगी edit कर सकती हो ? हाँ ....बस दो शब्दों से कैसे ? Depends फिर ज़िन्दगी को क्या कह कर पुकारुँगी यानि...? अगर तुम मुझमें सिर्फ "शामिल " हुए तो भी एडिटेड ज़िन्दगी और अगर कभी तुम "हासिल" हो गए तो भी एडिटेड ज़िन्दगी शामिल ज़िन्दगी को क्या कहोगी? मेरी खलिश और हासिल ज़िन्दगी को? मेरी ख्वाइश कमाल है ..तो क्या एक नाम से ज़िन्दगी edit हो जाती है ? होती तो है । एक बार नोश फरमा के देखो मेरा नाम ... हटा दो तो कम है ज़िन्दगी लगा दो तो हमदम है ज़िन्दगी Editing is just not adding the filters in you but also is to save the original you . बातें हैं.... आज कल तो ढ़ेर सारी हैं।😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें