ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1932

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कहानी इस लिए भी अधूरी रह गई कि कभी शब्द बिखर गए कभी स्याही…

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कहानी इस लिए भी अधूरी रह गई कि कभी शब्द बिखर गए कभी स्याही सूख गई। संवाद बचा है... सवाल.... ज़िंदा है? जवाब..... हाँ सवाल...तुम? जवाब....हाँ एक शब्द की तसल्ली से कहानी आगे बढ़ गयी अधूरी रह जाने के लिए एक बार और... अपने अपने शहर की ओर ( रंग और सुकून....रास्ते पर सजा दिखा ....खूबसूरती तलाशना भी हुनर है।)
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें