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रचना 1908

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दिल मेरी ना सुने....दिल की मैं ना सुनूँ

दिल मेरी ना सुने....दिल की मैं ना सुनूँ जब कहीं जाना न हो ...और पहुंचने का मन भी करे ...तो खुद से बेहतर कोई जगह नहीं। खुद में जुगनी बची रहनी चाहिए उस प्रेमी जुगनू तक पहुंचने के लिए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें