कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1888

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बहुत देर तक

बहुत देर तक ..... उँगलियों के बीच ..... कलम नचाते रहे कुछ .....सोच सोच मुस्कुराते रहे पर ..... कुछ लम्हे ..... लफ़्ज़ों में ना बंधे ...... तो बस..... ना ही बंधे ! इतना काफी है ..... या .....और लिखूं ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें