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रचना 1886

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कभी हासिल करने की सोची ही नहीं....इसी लिए पाती चली गयी।

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कभी हासिल करने की सोची ही नहीं....इसी लिए पाती चली गयी। लहर हूँ... खुद पास आती हूँ खुद दूर चली जाती हूँ... तुम्हारे साथ कोई हिसाब नहीं चलता । जब कभी मिल जाते हो ... पूरे पड़ते हो। न कम ...न ज्यादा शुक्रिया मेरे लिए प्रेम में भी एक अप्रेम बनाये रखने का।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें