कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1880

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काले से काला लिखना सबके बस की बात कहाँ

काले से काला लिखना सबके बस की बात कहाँ .... पर तुम ? तुम तो जादूगर हो ।इस स्याही में कितनी बूँद उदासी कितनी देर तक और किस तरह मिलानी है .... ये बस तुम ही जानते हो । देखो आज फिर इन पन्नों ने तुम्हारी उदासी का सुनहरा वर्क चिपका लिया है खुद पर... अक्षर अक्षर हंस रहा ।और तुम दूर कहीं मंद मंद मुस्कुरा रहे । इन उदासियों को मेरी तरफ सरका रहे। सुनहरा तोहफ़ा क़ुबूल है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें