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रचना 1860

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लफ़्ज़ों से तस्वीर उभार लेते हैं

लफ़्ज़ों से तस्वीर उभार लेते हैं , तस्वीर को लफ्ज़ उधार देते हैं , ये दीवानगी है शायद हममें ... कोरी पाती भी निखार लेते हैं। नीले के हर shade से प्यार है... है ना ?....तुम्हें भी। शाम छत पर तुम मिले ...ढ़ेर सारा ☺️☺️☺️☺️
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें