कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1857

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कितनी अजीब सी बात है कि मैं सिर्फ़ उसी के लिए लिखती हूँ और य…

कितनी अजीब सी बात है कि मैं सिर्फ़ उसी के लिए लिखती हूँ और ये कोई नहीं जानता ।वो खुद भी नहीं। मेरा उस तक कुछ भी पहुंचता नहीं पर मैं अगाध प्रेम में हूँ। उमींद के सारे बचे टुकड़े सिर्फ मेरे लिए ही तो चमचमाते हैं । खुश रहती हूँ बहुत....... हमेशा डायरी जानती है मेरी l 😊😊😊😊 तस्वीर कुछ दिन पहले की है पर कल्पना as usual मस्त है।
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