कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1850

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औरतें अक्सर गिरवी रखती हैं पंख और खरीद लाती हैं आँखें ....ख़…

औरतें अक्सर गिरवी रखती हैं पंख और खरीद लाती हैं आँखें ....ख़्वाब वाली क्योंकि.... उसे पसंद है चूल्हे से निकलने वाला धुआँ जो चुप्पी बनकर कभी आँखों ,कभी होठों ,कभी पूरी देह में चिपक जाता है...हँसते-हँसते उसे पसंद है "बचा "शब्द जिसको खुरच-खुरच कर भी वो पैदा कर सकती है अपने लिए पूरी एक किताब कविता वाली ....चुपके -चुपके उसे पसंद है लाल रंग का हर वो शेड जो उसकी देह पर कभी प्यार कभी वार का साक्ष्य रहा हो...बारी- बारी उसे पसंद है अपनी जुड़ी हुई हथेलियां सबके लिए जो कोख में तो बंद मुट्ठियां थी अब अंजुली भर है....खाली- खाली उसे पसंद है काँच से बनी चीजें ....चूड़ियों से लेकर वजूद तक जो पिघलने पर भी आकार ले सके ...भारी - भारी उसे पसंद हैं अपने देह पर बने स्ट्रेचमार्क्स जो लाख छिपाने पर भी उभरते हैं चेहरे पर सालों का ब्यौरा देते हुए .....पल- पल उसे पसंद है धुंध, हवा ,बादल जैसे लोग जिनकी छाँव में वो दिख सके पारदर्शी , चख सके धूप और उससे निकलते सात रंग ...खुमारी- खुमारी उसे पसंद है अपने तिल जो उसकी देह के मनके भर हैं जिन्हें फेर कर वो घूम आती है चारों धाम खुद में....रोज़ रोज़ उसे पसंद है पैरों की महावर जो तय करती है उसकी परिधि देखने ,सुनने और यहां तक कि सोचने भर की भी .... कभी कभी ये सारी बातें हैं.... बातों का क्या ख़्वाब वाली आँखों की गिरवी रखे पंखों की
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें