भाषा / Language
वो कहते हैं
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वो कहते हैं ....
वो कहते हैं
परखना मत,
परखने से कोई अपना नहीं रहता
ये भी सच है ....
कि परख लो तो कभी अपनी ,
कभी एक दूसरे की नजरों में ,
गिरने का डर नहीं रहता
वो कहते हैं
आँखों से कहो ,
लफ़्ज़ों का मंज़र हसीं नहीं होता
ये भी सच है ....
कि एक ठगे ,दूसरा फिसले ,
इन चिकने किरदारों पर यकीन नहीं होता
वो कहते हैं
जाने दो ,
गर जो लौटा तो अपना होता
ये भी सच है ...
कि जाने और आने का फासला
क्या पता उम्र होता या पल होता ?
Memories में लिखी हुई पुरानी याद और कल मिला नया नया निम्बूडा ।
Note: तस्वीर बस खींची है...खींची नहीं है। 😊😊😊😊
समंदर ही काफ़ी है डूब जाने के लिए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें