कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1833

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वो कहते हैं

वो कहते हैं .... वो कहते हैं परखना मत, परखने से कोई अपना नहीं रहता ये भी सच है .... कि परख लो तो कभी अपनी , कभी एक दूसरे की नजरों में , गिरने का डर नहीं रहता वो कहते हैं आँखों से कहो , लफ़्ज़ों का मंज़र हसीं नहीं होता ये भी सच है .... कि एक ठगे ,दूसरा फिसले , इन चिकने किरदारों पर यकीन नहीं होता वो कहते हैं जाने दो , गर जो लौटा तो अपना होता ये भी सच है ... कि जाने और आने का फासला क्या पता उम्र होता या पल होता ? Memories में लिखी हुई पुरानी याद और कल मिला नया नया निम्बूडा । Note: तस्वीर बस खींची है...खींची नहीं है। 😊😊😊😊 समंदर ही काफ़ी है डूब जाने के लिए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें