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रचना 1831

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होते हैं ऐसे कई चेहरे .....कई वजूद जिनसे चाह कर भी नाराज़ नह…

होते हैं ऐसे कई चेहरे .....कई वजूद जिनसे चाह कर भी नाराज़ नहीं रहा जा सकता । न चाहते हुए भी ये हमारे दिल का खाद पानी सोखते रहते हैं। हममें पलते रहते हैं। द्वार बंद कर दो तो दरार से झांकने का मन हो जाता है इन्हें ।अबोला लाख पसर जाए पर आंखें इन्हें ढूंढ़ना कभी बंद नहीं करती ।आदी होकर आदि कर देना कितना मुश्किल है। हम छलते हैं खुद को। लाख राहें मिटा दो ...नक्शे छिपा दो,दिशाएँ गुम कर दो ,तस्वीर धुन्दला दो.. तुम को बार बार क्यों खोजती हैं ये उंगलियां ? चले क्यों नहीं जाते तुम?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें