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रचना 1804

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जरूरतें लादते ज़िन्दगी घिस गयी

जरूरतें लादते ज़िन्दगी घिस गयी मुझ पर सुकून बांध दो ,एहसान हो थका सूरज ,मिला सागर की गोद में शायद कोई रिश्ता ,कोई पहचान हो प्यार का समुंदर ,ख्वाइश की मछली इश्क का ही जाल है ,मत परेशान हो बुलंदी आती भी है ,तो टिकती नहीं ऐसे की जैसे कोई नया मेहमान हो जुगनुओं ! तुम्हें माँ की दुआएं हैं तेरी हर गली में सूरज की दूकान हो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें